Search for a command to run...
यह शोध-प्रबंध ‘वास्तु’ शब्द की व्युत्पत्ति, उसके दार्शनिक एवं व्यावहारिक अर्थ तथा प्राचीन भारतीय वास्तुशास्त्र में वर्णित ग्राम-योजना के सिद्धांतों का व्यापक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। संस्कृत धातु ‘√वस्’ से निष्पन्न ‘वास्तु’ शब्द का मूल अर्थ ‘निवास’ या ‘आवास’ है, किन्तु विभिन्न प्राचीन कोशग्रंथों—जैसे अमरकोश, चिन्तामणि, शब्दार्थभानु एवं शब्दस्तोममहानिधि—में इसे निवासयोग्य भूमि के रूप में परिभाषित किया गया है। इस शोध में ‘Architecture’ शब्द की व्युत्पत्ति एवं उसके संभावित संस्कृत स्रोत ‘आर्किदक्ष्तौर्य’ के साथ उसके संबंध पर भी विचार किया गया है। प्राचीन ग्रंथों—विशेषतः ऋग्वेद, विश्वकर्मा वास्तुशास्त्र, मानसार, मयमत तथा कौटिल्य के अर्थशास्त्र—के आधार पर ‘वास्तु’ की व्यापक अवधारणा को स्पष्ट किया गया है, जिसमें केवल भवन ही नहीं, बल्कि उद्यान, सेतु, जलाशय, नगर एवं ग्राम भी सम्मिलित हैं। इस अध्ययन का प्रमुख भाग विश्वकर्मा वास्तुशास्त्र में वर्णित द्वादश (१२) प्रकार के ग्रामों—जैसे मण्डक, प्रस्तर, बाहुलिक, पराक, चतुर्मुख, पूर्वमुख, मङ्गल, विश्वकर्म, देवराट, विश्वेश, कैलास एवं नित्यमङ्गल—की संरचना, विन्यास एवं सामाजिक-आर्थिक विशेषताओं का विश्लेषण है। साथ ही, भूमि-चयन, दिशा-निर्धारण तथा पर्यावरण-संतुलन जैसे सिद्धांतों की भी व्याख्या की गई है। अतः यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारतीय वास्तुशास्त्र केवल निर्माण-कला नहीं, बल्कि एक समन्वित वैज्ञानिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रणाली है, जिसका उद्देश्य मानव जीवन को संतुलित, सुरक्षित एवं समृद्ध बनाना था।
Published in: International Journal of Science Strategic Management and Technology
Volume 02, Issue 03, pp. 1-9